CBSE Class 6 Hindi

मातृभूमि (कविता)

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पाठ सारांश एवं कवि परिचय

मातृभूमि (कविता)

कवि परिचय

मातृभूमि कविता के रचयिता श्री राजेंद्र प्रसाद हैं, जो भारत के प्रथम राष्ट्रपति थे। वे केवल एक राजनेता ही नहीं, बल्कि एक महान विद्वान, समाज सुधारक और साहित्यकार भी थे। उनका जन्म ३ दिसंबर, १८८४ को बिहार के सीवान जिले में हुआ था।

{{VISUAL: photo: भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद का चित्र, सादगी और गरिमा का प्रतीक}}

{{KEY: type=definition | title=डॉ राजेंद्र प्रसाद का साहित्यिक योगदान | text=डॉ राजेंद्र प्रसाद ने देशभक्ति, नैतिक मूल्यों और भारतीय संस्कृति पर अनेक रचनाएँ लिखीं। उनकी भाषा सरल, सहज और प्रभावशाली थी। वे हिंदी भाषा के प्रबल समर्थक थे।}}

डॉ राजेंद्र प्रसाद का जीवन परिचय

डॉ राजेंद्र प्रसाद ने कलकत्ता विश्वविद्यालय से कानून की शिक्षा प्राप्त की और वकालत की। लेकिन महात्मा गांधी के आह्वान पर उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भाग लिया। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे। स्वतंत्र भारत में उन्होंने १९५० से १९६२ तक राष्ट्रपति के रूप में देश की सेवा की।

प्रमुख रचनाएँ:

  • आत्मकथा (मेरी यूरोप यात्रा)
  • बापू के कदमों में
  • भारतीय संस्कृति और खादी का अर्थशास्त्र
  • विभिन्न देशभक्ति कविताएँ और निबंध

उनके व्यक्तित्व में सादगी, सत्यनिष्ठा और राष्ट्रभक्ति की त्रिवेणी प्रवाहित होती थी। वे सच्चे अर्थों में राष्ट्रसेवक थे, जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन मातृभूमि की सेवा में समर्पित कर दिया।


पाठ का सारांश

मातृभूमि कविता में कवि ने भारत भूमि के प्रति अपनी गहन श्रद्धा, प्रेम और सम्मान को अभिव्यक्त किया है। यह कविता देशभक्ति की भावना से ओत-प्रोत है। कवि अपनी जन्मभूमि को माँ के समान पूजनीय मानते हैं।

{{KEY: type=concept | title=मातृभूमि का अर्थ | text=मातृभूमि का अर्थ है – माँ के समान भूमि। जिस धरती पर हमने जन्म लिया, जहाँ हम पले-बढ़े, वह हमारी मातृभूमि है। भारतीय संस्कृति में भूमि को माँ का दर्जा दिया गया है क्योंकि वह हमारा पालन-पोषण करती है।}}

कविता का केंद्रीय भाव

इस कविता में कवि ने निम्नलिखित भावों को व्यक्त किया है:

१. मातृभूमि के प्रति कृतज्ञता:
कवि अपनी जन्मभूमि भारत के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। यह भूमि हमें अन्न, जल, वायु और जीवन की सभी आवश्यकताएँ प्रदान करती है। हमारा अस्तित्व इसी धरती के कारण है।

२. भारत की महानता:
कवि भारत की प्राचीन संस्कृति, उसके गौरवशाली इतिहास, और उसकी प्राकृतिक सुंदरता का वर्णन करते हैं। हिमालय की ऊँची चोटियाँ, गंगा-यमुना जैसी पवित्र नदियाँ, हरे-भरे मैदान और फल-फूलों से लदे वृक्ष – यह सब भारत की विशेषता है।

३. देशभक्ति की भावना:
कवि का संदेश है कि हमें अपनी मातृभूमि से प्रेम करना चाहिए और उसकी रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए। जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी – माँ और मातृभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर हैं।

{{KEY: type=points | title=कविता के मुख्य संदेश | text=- अपनी मातृभूमि से प्रेम करना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है।

  • भारत की संस्कृति, परंपरा और प्रकृति अनुपम है।
  • देश की सेवा करना सबसे बड़ा पुण्य है।
  • मातृभूमि के सम्मान के लिए हर त्याग करना चाहिए।}}

४. त्याग और समर्पण:
कवि कहते हैं कि हमें अपनी मातृभूमि की सेवा और रक्षा के लिए हर प्रकार का त्याग करने के लिए तैयार रहना चाहिए। अनगिनत वीरों ने इस धरती की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों की आहुति दी है।

कविता की भाषा और शैली

यह कविता सरल और सहज हिंदी भाषा में रची गई है। कवि ने भावात्मक शैली का प्रयोग किया है जिससे पाठक के मन में देशप्रेम की भावना जागृत होती है। कविता में लयात्मकता है जो इसे गेय बनाती है।

भाषा की विशेषताएँ:

  • शुद्ध हिंदी शब्दावली का प्रयोग
  • भावनाओं की सहज अभिव्यक्ति
  • मातृभूमि को मानवीय रूप में चित्रित करना (मानवीकरण अलंकार)
  • देशभक्ति से परिपूर्ण शब्दों का चयन

{{KEY: type=exam | title=परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण | text=कविता के केंद्रीय भाव, कवि द्वारा दिए गए संदेश और भारत की महानता से संबंधित प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं। कविता की पंक्तियों का भावार्थ भी परीक्षा में महत्वपूर्ण है।}}

कविता का शिक्षाप्रद संदेश

यह कविता छात्रों के मन में देशप्रेम, राष्ट्रीय गौरव और अपनी संस्कृति के प्रति सम्मान की भावना जगाती है। यह हमें सिखाती है कि:

  • हमें अपनी मातृभूमि पर गर्व होना चाहिए
  • देश की प्रगति में अपना योगदान देना चाहिए
  • राष्ट्रीय संपत्ति और संसाधनों का सदुपयोग करना चाहिए
  • भारतीय संस्कृति और मूल्यों को संजोकर रखना चाहिए

कविता का महत्व

आज के युग में जब युवा पीढ़ी पाश्चात्य संस्कृति की ओर आकर्षित हो रही है, तब यह कविता और भी अधिक प्रासंगिक हो जाती है। यह हमें अपनी जड़ों से जुड़े रहने और अपनी मातृभूमि के प्रति कर्तव्य निभाने की प्रेरणा देती है।

{{ZOOM: title=मातृभूमि और राष्ट्रवाद | text=भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान देशभक्ति कविताओं ने जनमानस को जागृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। डॉ राजेंद्र प्रसाद स्वयं स्वतंत्रता सेनानी थे, इसलिए उनकी रचनाओं में राष्ट्रप्रेम का स्वाभाविक समावेश है।}}

माँ और मातृभूमि स्वर्ग से भी महान हैं – यही इस कविता का सार है।


अगले पृष्ठ पर: कविता के कठिन शब्दों के अर्थ और पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ का विस्तृत अध्ययन करेंगे।


कठिन शब्दार्थ

कठिन शब्दार्थ

कविता को समझने के लिए सबसे पहले उसमें प्रयुक्त कठिन शब्दों का अर्थ जानना आवश्यक है। मातृभूमि कविता में अनेक संस्कृतनिष्ठ और तत्सम शब्दों का प्रयोग हुआ है। इन शब्दों के सही अर्थ को समझे बिना कविता का भाव स्पष्ट नहीं हो सकता। यहाँ हम प्रत्येक शब्द का अर्थ विस्तार से समझेंगे।

{{VISUAL: photo: भारत का राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा लहराता हुआ एक पहाड़ी क्षेत्र में}}

{{KEY: type=definition | title=मातृभूमि का अर्थ | text=मातृभूमि का अर्थ है जन्मभूमि या वह भूमि जहाँ हमारा जन्म हुआ हो। यह शब्द माता और भूमि से मिलकर बना है, जो अपनी जन्मस्थली के प्रति माँ जैसा प्रेम और सम्मान दर्शाता है।}}

शब्दार्थ तालिका (भाग-1)

शब्दअर्थवाक्य प्रयोग
मातृभूमिजन्मभूमि, अपना देशहमारी मातृभूमि भारत महान है।
वन्दनाआदर सहित प्रणाम, पूजाहम अपनी मातृभूमि की वन्दना करते हैं।
जननीमाता, माँभारत हमारी जननी के समान है।
कण-कणछोटे से छोटा कण, हर कणइस धरती का कण-कण पवित्र है।
धन्यभाग्यशाली, पुण्यात्मायह धरती धन्य है।
पावनपवित्र, शुद्धयह पावन भूमि है।

शब्दार्थ तालिका (भाग-2)

शब्दअर्थवाक्य प्रयोग
वीरसाहसी, बहादुरयहाँ अनेक वीर हुए हैं।
चरणपैर, पाँवमैं मातृभूमि के चरणों में नमन करता हूँ।
श्रद्धासम्मान, आदर, भक्तिहमें अपने देश के प्रति श्रद्धा रखनी चाहिए।
त्यागबलिदान, छोड़नाहमारे वीरों ने देश के लिए त्याग किया।
समर्पणअर्पण करना, सौंपनाजीवन मातृभूमि को समर्पित है।
गौरवगर्व, शानभारत हमारा गौरव है।

{{KEY: type=concept | title=संस्कृतनिष्ठ शब्द | text=कविता में अधिकतर संस्कृतनिष्ठ शब्द हैं जैसे मातृभूमि, वन्दना, पावन आदि। ये शब्द संस्कृत भाषा से हिंदी में आए हैं और इनका प्रयोग औपचारिक और सम्मानजनक भाषा में होता है।}}

शब्दार्थ तालिका (भाग-3)

शब्दअर्थवाक्य प्रयोग
वैभवसमृद्धि, धन-संपत्तिभारत का वैभव अद्भुत है।
सुहावनसुंदर, मनोहरयह धरती कितनी सुहावन है।
विशालबहुत बड़ा, विस्तृतहमारी मातृभूमि विशाल है।
कोटि-कोटिकरोड़ों, अनगिनतकोटि-कोटि नमन।
नमनप्रणाम, अभिवादनमैं मातृभूमि को नमन करता हूँ।
संस्कृतिसभ्यता, रीति-रिवाजभारतीय संस्कृति महान है।

विशेष शब्द समूह

देशभक्ति से संबंधित शब्द:

  • देश = राष्ट्र, अपना देश
  • देशवासी = देश में रहने वाले लोग
  • राष्ट्र = देश, राज्य
  • स्वतंत्रता = आज़ादी
  • बलिदान = त्याग, कुर्बानी
  • वीरता = साहस, शूरता
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{{KEY: type=points | title=तत्सम और तद्भव शब्द | text=- तत्सम शब्द सीधे संस्कृत से आए हैं जैसे मातृभूमि, वन्दना, पावन।

  • तद्भव शब्द संस्कृत से बदलकर हिंदी में आए हैं जैसे धरती (धरित्री से)।
  • कविता में अधिकतर तत्सम शब्दों का प्रयोग गरिमा और भक्ति भाव के लिए हुआ है।}}

शब्दार्थ तालिका (भाग-4)

शब्दअर्थवाक्य प्रयोग
विरासतपुरखों की देन, धरोहरहमारी संस्कृति हमारी विरासत है।
धरोहरविरासत, उत्तराधिकारयह धरोहर हमें संभालनी है।
अमरकभी न मरने वाला, शाश्वतशहीद अमर हो जाते हैं।
शहीददेश के लिए बलिदान देने वालाहमारे शहीदों को नमन।
स्वर्णिमसुनहरा, सुंदरहमारा स्वर्णिम इतिहास।
उन्नतिप्रगति, विकासदेश की उन्नति हमारा लक्ष्य है।

{{ZOOM: title=शब्द-निर्माण की प्रक्रिया | text=मातृभूमि = माता + भूमि (समास द्वारा)। कण-कण = पुनरुक्ति शब्द (एक शब्द की दोहराई)। कोटि-कोटि = भी पुनरुक्ति शब्द जो संख्या की अधिकता दर्शाता है। ऐसे शब्दों से भाव में गहराई और प्रभाव आता है।}}

प्रयोग में ध्यान देने योग्य बातें

समास युक्त शब्द:

  1. मातृभूमि = माता + भूमि (तत्पुरुष समास)
  2. कण-कण = पुनरुक्ति द्वारा निर्मित
  3. कोटि-कोटि = पुनरुक्ति द्वारा निर्मित

भावनात्मक शब्द:

  • वन्दना, नमन, श्रद्धा - ये सभी सम्मान और प्रेम दर्शाते हैं
  • त्याग, बलिदान, समर्पण - ये देशभक्ति की भावना व्यक्त करते हैं
  • धन्य, पावन, गौरव - ये आदर और महत्व प्रकट करते हैं

{{KEY: type=exam | title=परीक्षा में पूछे जाने वाले शब्द | text=मातृभूमि, वन्दना, कण-कण, पावन, श्रद्धा, त्याग, गौरव और कोटि-कोटि जैसे शब्दों के अर्थ परीक्षा में अक्सर पूछे जाते हैं। इन्हें वाक्य प्रयोग सहित याद रखें।}}

अभ्यास के लिए शब्द समूह

पर्यायवाची शब्द:

  • मातृभूमि = जन्मभूमि, जननी भूमि, देश, राष्ट्र
  • वन्दना = पूजा, अर्चना, स्तुति, नमन
  • पावन = पवित्र, शुद्ध, निर्मल
  • वीर = शूरवीर, बहादुर, साहसी, पराक्रमी

याद रखें: शब्दार्थ को केवल रटें नहीं, बल्कि उनका सही प्रयोग वाक्यों में करके समझें। यह आपकी शब्द संपदा को बढ़ाएगा और कविता का भाव स्पष्ट होगा।

इन शब्दों को अच्छे से समझकर आप कविता के मूल भाव को आसानी से पकड़ सकेंगे। अगले भाग में हम कविता की पंक्ति-दर-पंक्ति व्याख्या करेंगे।


कविता का भावार्थ

कविता का भावार्थ

कविता 'मातृभूमि' में कवि ने भारत भूमि के प्रति अपनी गहरी भावनाओं को अभिव्यक्त किया है। यह कविता हमें सिखाती है कि हमारी जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है। आइए प्रत्येक पंक्ति का भावार्थ विस्तार से समझें।

{{VISUAL: photo: भारत की विविधता को दर्शाता प्राकृतिक दृश्य - हरे खेत, पहाड़ और नदियाँ}}

पहला पद - भारत भूमि की महानता

"जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी"

कविता की शुरुआत संस्कृत की इस प्रसिद्ध पंक्ति से होती है। इसका अर्थ है - माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी महान हैं। कवि यह स्थापित करना चाहते हैं कि भौतिक सुख-सुविधाओं से भरे स्वर्ग की तुलना में भी हमारी जन्मभूमि अधिक महत्वपूर्ण है। यह पंक्ति देशप्रेम की नींव रखती है।

{{KEY: type=concept | title=मातृभूमि का महत्व | text=कवि के अनुसार मातृभूमि केवल एक भूमि का टुकड़ा नहीं है, बल्कि हमारी पहचान, संस्कृति और अस्तित्व का आधार है। यह वह पवित्र धरती है जहाँ हमने जन्म लिया और बड़े हुए।}}

"धन्य है वह धरती, धन्य है वह माटी"

कवि भारत की धरती को धन्य (पवित्र और भाग्यशाली) कहते हैं। यह माटी साधारण मिट्टी नहीं, बल्कि असंख्य महापुरुषों, वीरों और संतों की जन्मभूमि है। हर कण में त्याग, तपस्या और बलिदान की गाथाएँ समाई हुई हैं।

दूसरा पद - प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन

"हिमालय का मस्तक ऊँचा, गंगा-यमुना का जल पावन"

कवि भारत की प्राकृतिक विशेषताओं का वर्णन करते हैं। हिमालय को मस्तक (सिर) कहकर कवि ने उसकी गरिमा और ऊँचाई को दर्शाया है। यह पर्वत भारत की रक्षा करता है, मानो एक रक्षक की तरह। गंगा और यमुना के पावन (पवित्र) जल का उल्लेख करते हुए कवि बताते हैं कि ये नदियाँ केवल जल स्रोत नहीं, बल्कि हमारी आस्था और विश्वास का केंद्र हैं।

{{KEY: type=points | title=भारत की प्राकृतिक विशेषताएँ | text=- हिमालय पर्वत की भव्यता और रक्षक भूमिका

  • गंगा-यमुना जैसी पवित्र नदियों की उपस्थिति
  • विविध प्राकृतिक सम्पदा से भरी भूमि
  • मौसमों की विविधता और उर्वर मिट्टी}}

"फूलों की वाटिका, फसलों से लहलहाते खेत"

भारत की धरती की उर्वरता का सुंदर चित्रण है यह। यहाँ रंग-बिरंगे फूलों की वाटिकाएँ हैं जो प्राकृतिक सौंदर्य को दर्शाती हैं। लहलहाते खेत किसानों की मेहनत और धरती की उर्वरा शक्ति का प्रतीक हैं। ये खेत देश को अन्न प्रदान करते हैं और समृद्धि लाते हैं।

तीसरा पद - सांस्कृतिक विरासत

"ऋषि-मुनियों की यह तपोभूमि, वीरों की यह कर्मभूमि"

यह पंक्ति भारत की आध्यात्मिक और वीरता की परंपरा को उजागर करती है। तपोभूमि का अर्थ है - वह भूमि जहाँ ऋषि-मुनियों ने तपस्या की, ज्ञान प्राप्त किया और मानवता को मार्ग दिखाया। कर्मभूमि का अर्थ है - वह भूमि जहाँ अनगिनत वीरों ने अपने कर्तव्यों का पालन किया, देश की रक्षा के लिए प्राण न्योछावर किए।

{{KEY: type=definition | title=तपोभूमि और कर्मभूमि | text=तपोभूमि वह पवित्र स्थान है जहाँ आध्यात्मिक साधना होती है। कर्मभूमि वह स्थान है जहाँ मनुष्य अपने कर्तव्यों का निर्वाह करते हुए जीवन जीता है।}}

"संस्कृति और सभ्यता का पालना"

भारत को विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों में से एक माना जाता है। यहाँ की संस्कृति और सभ्यता ने विश्व को अनेक ज्ञान और मूल्य दिए हैं। पालना शब्द से कवि का आशय है कि भारत में ही इन महान परंपराओं का जन्म और पालन-पोषण हुआ।

चौथा पद - राष्ट्रप्रेम की भावना

"तेरी गोद में पले-बढ़े हम, तेरा ऋण कैसे चुकाएँ"

कवि भावविभोर होकर कहते हैं कि हम सब इस मातृभूमि की गोद में पले और बड़े हुए हैं। माँ की तरह इस धरती ने हमें सब कुछ दिया - पहचान, भोजन, आश्रय, संस्कार। यह ऋण इतना बड़ा है कि शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। यह प्रश्न "तेरा ऋण कैसे चुकाएँ" हमारी कृतज्ञता को दर्शाता है।

{{KEY: type=exam | title=परीक्षा में पूछा जाता है | text=कवि मातृभूमि के ऋण को कैसे चुकाना चाहते हैं? इस प्रश्न के उत्तर में देशसेवा, कर्तव्यपालन, ईमानदारी और देशप्रेम जैसे मूल्यों का उल्लेख अवश्य करें।}}

"तन-मन-धन से सेवा करें, यही हमारा संकल्प"

अंतिम पंक्ति में कवि संकल्प लेते हैं कि हम अपने तन (शरीर), मन (विचार), और धन (संपत्ति) से मातृभूमि की सेवा करेंगे। यह पंक्ति हमें सिखाती है कि देशप्रेम केवल बातों में नहीं, बल्कि कर्मों में होना चाहिए। प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह अपनी क्षमता के अनुसार देश को मजबूत और समृद्ध बनाने में योगदान दे।


काव्य-सौंदर्य की विशेषताएँ

कविता में सरल और भावपूर्ण भाषा का प्रयोग किया गया है। संस्कृत, हिंदी और उर्दू के शब्दों का सुंदर समन्वय है। तत्सम शब्द (जननी, मातृभूमि, गरीयसी) कविता को गंभीरता प्रदान करते हैं, जबकि सरल शब्द (माटी, खेत, फूल) इसे सहज बनाते हैं।

{{KEY: type=concept | title=कविता का केंद्रीय भाव | text=इस कविता का मुख्य संदेश है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी मातृभूमि से प्रेम करना चाहिए और उसकी सेवा को अपना परम कर्तव्य मानना चाहिए। देशप्रेम केवल एक भावना नहीं, बल्कि जीवन जीने का तरीका है।}}

अनुप्रास अलंकार (जननी जन्मभूमि, धन्य धरती) और रूपक अलंकार (हिमालय को मस्तक कहना, भारत को माता कहना) से कविता में सौंदर्य आया है। लय और तुकांत शब्दों के कारण कविता गाने योग्य बन गई है।

यह कविता बच्चों में राष्ट्रप्रेम की भावना जगाने के साथ-साथ उन्हें अपनी जड़ों से जुड़े रहने की प्रेरणा देती है।

In this chapter

  • 1.पाठ सारांश एवं कवि परिचय
  • 2.कठिन शब्दार्थ
  • 3.कविता का भावार्थ

Frequently asked questions

What is पाठ सारांश एवं कवि परिचय?

डॉ राजेंद्र प्रसाद ने कलकत्ता विश्वविद्यालय से कानून की शिक्षा प्राप्त की और वकालत की। लेकिन महात्मा गांधी के आह्वान पर उन्होंने **स्वतंत्रता संग्राम** में सक्रिय भाग लिया। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे। स्वतंत्र भारत में उन्होंने **१९५०** से **१९६२** तक राष्ट्रपति के रूप में देश की सेवा की।

What is कठिन शब्दार्थ?

कविता को समझने के लिए सबसे पहले उसमें प्रयुक्त कठिन शब्दों का अर्थ जानना आवश्यक है। **मातृभूमि** कविता में अनेक संस्कृतनिष्ठ और तत्सम शब्दों का प्रयोग हुआ है। इन शब्दों के सही अर्थ को समझे बिना कविता का भाव स्पष्ट नहीं हो सकता। यहाँ हम प्रत्येक शब्द का अर्थ विस्तार से समझेंगे।

What is कविता का भावार्थ?

कविता **'मातृभूमि'** में कवि ने भारत भूमि के प्रति अपनी गहरी भावनाओं को अभिव्यक्त किया है। यह कविता हमें सिखाती है कि हमारी जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है। आइए प्रत्येक पंक्ति का भावार्थ विस्तार से समझें।

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